संदेश इंडिया में आपका स्वागत है आप देख रहे है संदेश इंडिया 24x7 न्यूज़ चैनल.... आप संदेश इंडिया को www.sandeshindia.com पर लाइव देख सकते है । आप फेसबुक , यूट्यूब , ट्विटर पर फॉलो भी कर सकते है । लाइव , डीलाइव , रिकॉर्डिंग , विज्ञापन , कथा - भगवत , व अन्य प्रोग्राम के लिये संपर्क करें - 9456800620 .... संदेश इंडिया को आवश्यकता है संवाददाता , कैमरामैन , मार्केटिंग मैनेजर की । आप हमें ईमेल करें - sandeshindiatv@gmail.com पर ....

माँ दुर्गा, माँ कशहरी, माँ जालिपा देवी की महिमा निराली

उन्नाव (संवाददाता )। नवरात्र में माँ दुर्गा माँ कशहरी माँ जालिपा देवी की महिमा निराली है। हजारों भक्त इस शरदीय नवरात्रि में माँ की  पूजा  पाठ कर आशीर्वाद लेते हैं। जिससे सभी भक्तों का जीवन धन्य हो जाता है। सुबह से ही तीनों देवियों के दरबार में घंटो शंख और मंजीरों की आवाज के साथ सारा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

कस्बे के तीनों कोनों में बसे माँ के दरबार की महिमा निराली है। अति  प्राचीन व  पौराणिक मंदिर होने के नाते यह त्रिकोणीय आकार में बनती दिखाई देती है। इन  पौराणिक मंदिरों के बारे में जानकार बताते हैं कि इन मंदिरों में माँ दुर्गा मंदिर जो कि कस्बे से लगभग चार किमी की दूरी पर भितरेपार ग्राम एक झील के उस  पार स्थित है। जहाँ पर एक ऊंचे टीले पर जगदगिन ऋषि का आश्रम है। जानकार बताते हैं कि यहीं  पर परशुराम का जन्म हुआ था। वह बचपन से ही बड़े तेजस्वी थे। इस झील के ऊंचे  पर बैठकर वहां की सुन्दरता का अहसास किया जा सकता है। एक बार ऋषि जगदगिन अपनी ही कुटिया  पर बैठे पूजा  पाठ कर रहे थे। ऋषिवर के  पास एक कामधेनु गाय थी जिसकी दूर दूर तक बड़ी चर्चा थी। एक बार राजा सहस्रबाहु उधर से ही गुजर रहे थे। वहीं रास्ते में ऋषिवर की कुटिया  पड़ी जहाँ  पर राजा ने अपनी पूरी सेना के साथ रूककर ऋषिवर से आशीर्वाद लिया। जिस पर ऋषिवर ने उन्हें जलपान आदि के लिए आग्रह किया। राजा बोले ऋषिवर आ की कुटिया में हमारी सारी सेना के भोजक की क्या व्यवस्था हो सकती है तभी ऋषिवर ने उसकी कामधेनु गाय के निकलने वाले अमृत समान दूध से ही सारी सेना का पेट भर दिया। इसे देख राजा सहस्रबाहु आश्चर्य चकित हो गये। उन्होंने मन ही मन उस कामधेनु गाय को लेने का मन बना लिया और ऋषि से गाय लेने की बात कही जिस पर ऋषि ने गाय को देने से मना कर दिया। जिससे राजा काफी आहत हुए और वहां से चले गये। बताते हैं इसी बीच  रशुराम तपस्या के लिये निकल  पड़े। कुटिया  पर ऋषिवर अकेले ही थे तभी राजा सहस्रबाहु के पुत्रों ने समय का एहसास करते हुए कुटिया  पर आ गये और ऋषिवर से कामधेनु गाय मांगी। बदले में एक लाख गाय स्वर्णजड़ित देने की बात कही  पर ऋषिवर तैयार नहीं हुए। जिस पर उन्होंने बलपूर्वक गाय को अपने कब्जे में ले लिया और जगदगिन ऋषि का वध कर दिया। उधर  परशुराम जब तपस्या करके अपनी कुटिया वापस आये तो उन्हें अपने पिता के मृत्यु का समाचार मिला जिससे उनके क्रोध की सीमा नहीं रही उन्होंने अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध व गाय वापस लाने की ठान ली। वह अपनी कुटिया से वापस आकर नगर में माँ दुर्गा की स्थापना कर पूजा  पाठ की माता ने  प्रसन्न होकर विजय का आशीर्वाद दिया। उसके  पश्चात उन्होंने राजा सहस्रबाहु के  पुत्रों का वध किया और माता रूपी गाय को अपने साथ अपनी कुटिया ले आये। तभी अष्टड्ढ भुजाओं वाली माँ दुर्गा की स्थापना हुई।

इसके साथ ही नगर से मात्र 3 किलोमीटर की दूरी पर माँ कुशहरी देवी का मंदिर है। इस मंदिर के स्थपना को लेकर पौराणिक मान्यता है कि सीता माता को लिवाने जब लव व कुश परियर जा रहे थे तो यही विश्राम के लिए रूके थे। जहां पास में ही एक कुआ था जब उनके सैनिक कुऐ से पानी निकालने लगे तो उनहे एक दिव्य शक्ति ने आभास कराया की कुए में कुछ है जिस पर जब भगवान राम के पुत्र कुश ने कुए में जाकर देखा तो उन्हे माता की मूर्ति मिली जिसे भगवान कुश ने उसे वही एक टीले पर स्थापित कर पूजा अर्चना की और अपने कुछ सैनिकों को वही एक गांव बसाने का आदेश दिया तकि माता की पूजा अनवरत होती रहें।

समूचे भारत में यही एक कुशेहरी देवी का मंदिर है जिसमें आज भी मंदिर के पीछे कसौटी पत्थर पर एक ही छत्रधारी घोड़े पर सवार लव कुश की मूर्ति भी बनी है।इससे प्रमाणित होता है कि देवी जी का संबंध लव कुश से रहा होगा।ऐसा पुरातत्व वेदता यहां आकर सिद्ध भी कर चुके है और इसके बाद सरकार के पर्यटन विभाग ने भी इसक पर्यटन स्थल घोषित कर दिया था। इसके साथ ही पुरात्तव विभाग ने भी इसकी प्रमाणिकता देखते हुए इसे संरक्षित स्थल घोषित किया है।

माता कुसेहरी के मंदिर के ठीक सामने एक विशाल सरोवर भी बना है जो गऊ घाट की झील में मिलता है।मंदिर के बाहर आम नीम कंदब इमली पीपल के वृक्ष बड़ी संख्या में है। जिससे मंदिर प्रागण व आस पास का स्थल बना ही मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करता है।

इस मंदिर को मुगल काल के दौरान तहस नहस करने का प्रयास किया गया और मंदिर को तोड़ फोड़ दिया गया इससे पूर्व की मुगलिया शासन काल में मूर्ति के साथ भी तोड़ फोड़ होती माता के भक्तों ने उसे छिपा दिया था।इसके पुननिर्माण के विषय में बताया जात है कि 1850 के लगभग नवाब वाजिद अली शाह के चकलेदार कायस्थ वंशी ठा. प्रसाद जी उन्नाव जनवद के पुरवा निवासी उसके यहां की नर्तकी भुलन  के शरीर को लकवा मार गया था और उसने यहां मंदिर मंे माता से उसे ठीक करने का आशीर्वाद मांगा था और जिससे वह ठीक होगयी तब उसने माता के मंदिर का जीर्णोद्वार कराया उसे टीले से लाकर पुनः स्थापित करा एक भव्य मंदिर बनवा दिया।

वही त्रिकोण में बसी मां जालिपा देवी की भी पूजन प्रथा एक जैसी है वहां भी कन्याओं को नवरात्रों में कन्याभोज और भण्डारे का आयोजन भक्तगणों द्वारा किया जाता है।

इन दोनों मंदिरों में एक पुरानी प्रथा प्रचलित थी जिसमें बकरे की बलि चड़ाई जाती थी जिसका विरोध कबीर पंथी बाबा रघुवर दास ने 1940 में किया और क्षेत्र के लोगो को जागरूक करने का प्रयास किया कि मंदिर में ऐसा कृत्य धर्मिकता के दायरे में नही आता तब जाकर दोनो मंदिरों में बलि देने की प्रथा का अंत हुआ उसके बाद बलि की मान्यता करने वाले भक्त बकरों की बलि देने के बजाय उनके कान छेद कर छोड़ देते थे। पूर्व में जिस टीले में माता कुशहरी देवी की मंदिर मुगलों से बचाने के लिए छुपाई गयी थी आज वही पर राम भक्त हनुमान की एक विशाल मंदिर का निर्माण भी किया गया है।

इन दोनो मंदिरो की पौराणिक मान्यता होने की वजह से यहां पर दोनो ही नवरात्रों में भक्तों की अपार भीड़ होती है। मंदिरों में आकर लोग मुण्डन उपनयन संस्कार भी करते है। माता कुशहरी देवी को कुछ भक्त अपनी कुल देवी के रूप में भी मान्यता देते है। भक्तो में आस्था है कि माता कुशहरी देवी भक्तों में उनके रोगो का  समूल नाश करती वही नवाबगंज के माँ दुर्गा मंदिर के बारे में भक्तों का कहना है कि यहां मांगी गयी हर मन्नत मां पूरी करती है।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *